Wednesday, March 19, 2014

ना हाथ कि ताक़त इस शहर को
सवार सकि
ना फूल कि खुसबू इस शहर में
बहार ला सकि

वादा तो था, हर घर को जगमगाने का
मगर अफ़सोस, वो बिजली के तार भी
घर तक पहुँचा ना सके

सुख जाता है गला,
सर्दीयों में भी यहाँ
जलमीनार का वादा किया था,
पानी का नल तक घर में लगवा ना सके

जब जब गुजरता हूँ  मैं,
इन् सड़कों सॆ ,
वो बताती है, शहर कि जर्जरता का हाल ,
और पूछती है,
किसके हवाले, किया था मुझको ,
जो मेरी मरम्मत तो दूर ,
एक  गड्डे तक भरवा ना सके

हर बार सुनता हूँ मैं
वादों की आकासवाणी
चुनावी त्यौहार में ,
मगर क्यूँ नहीं होते वो पूरे
आजतक, वो कभी बता ना सके

"रहेगी कब तलक वादों में क़ैद खुश हॉली
हरेक बार ही कल क्यूँ, कभी तो आज भी हो… "

इस बार वादों कि नहीं
अमिताभ के इरादों कि राजनीती
  





Thursday, September 27, 2012

किरण 
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आशाओ कि किरण है वो
उम्मीदो का साया है
मेरे तनहा से जीवन मे
कुछ पल खुसीओं की लाई है

समय के पहिये ने
उसे खूब घुमाया है
कुछ घाव दिए गहरे
और बेवजह सताया है

उन गहरे घाओ पर
उसकी हँसी का साया है
ये किरन ही है जिसने
अपने अन्दर के किरण को बचाया है

है चंचल सी अदा उसकी
जो हर दर्द छुपाती है
पर न जाने मुझ मे क्या है
जो वो हर बात बताती है

कुछ ख्वाइस है उसकी
कुछ सपनो के ताने बाने है
साथ मे चलके
उन सब को पुरा करने का
वक़्त अब आया है


आशाओ कि किरण है वो
उम्मीदो का साया है ......










Saturday, March 31, 2012




बचपन  की  होली 
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खूब  खेली  थी , होली  हमने 
गालिओ  और  चौबारों  मे
खूब  उडाये गुलाल  हमने 
और  भरे  थे रंग  गुब्बारों  मे

खूब  जलाई  होलिका  हमने
अमावास  की  अँध्यारो  मे
खूब  मांगी  थी  होलिका  की  लकड़ी
हर  घर  और , हर  द्वारो  मे

जिस  ने  भी  दी  होली  की  लकड़ी
उनको  हमने  दी  खूब  बधाई  थी
और  जिस  ने  न  दी
उसकी  हमने , कुर्सी ,चौंकी , खटिया , कम्बल 
और  न  जाने  क्या -क्या ….रातो  रात  उड़ाई  थी

चार  मांगी  हुई  लकड़ी  के  नीचे
चालीस  चोरी  की  लकड़ी  जलाई  थी
और  सुबह  सुबह ….उसी  रख  का  धुल  उडा -के , ढोल बजा  के
हमने  पड़ोसियों  को  खूब  चिढाई  थी

बचपन  का  वो  होली  का  रंग
हर  रंगों  से  गहरा  है
हर  रंगों  से  सुर्ख  है  ये
और  हर  रंगों  से  सुनहरा  है 

                                       मनीष कुमार