Wednesday, March 19, 2014

ना हाथ कि ताक़त इस शहर को
सवार सकि
ना फूल कि खुसबू इस शहर में
बहार ला सकि

वादा तो था, हर घर को जगमगाने का
मगर अफ़सोस, वो बिजली के तार भी
घर तक पहुँचा ना सके

सुख जाता है गला,
सर्दीयों में भी यहाँ
जलमीनार का वादा किया था,
पानी का नल तक घर में लगवा ना सके

जब जब गुजरता हूँ  मैं,
इन् सड़कों सॆ ,
वो बताती है, शहर कि जर्जरता का हाल ,
और पूछती है,
किसके हवाले, किया था मुझको ,
जो मेरी मरम्मत तो दूर ,
एक  गड्डे तक भरवा ना सके

हर बार सुनता हूँ मैं
वादों की आकासवाणी
चुनावी त्यौहार में ,
मगर क्यूँ नहीं होते वो पूरे
आजतक, वो कभी बता ना सके

"रहेगी कब तलक वादों में क़ैद खुश हॉली
हरेक बार ही कल क्यूँ, कभी तो आज भी हो… "

इस बार वादों कि नहीं
अमिताभ के इरादों कि राजनीती
  





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